रसलीन और श्रृंगार रस

 

रामरतन चैधरी

शोधार्थी (हिन्दी), वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर (0प्र0)

*Corresponding Author E-mail: umeshmishra7843@gmail.com

 

ABSTRACT:

रसलीन रीतिकालीन कवि है। रीति एक परंपरा का नाम है। जिसके अंतर्गत श्रृंगार रस प्रधान रस के रूप में है। श्रृंगार रस वर्णन की परंपरा प्राकृत काव्य से होती हुई आदिकाल में आती है। आदिकाल के पश्चात वह भक्तिकाल के काव्य में निगर्मित होती है।

 

KEYWORDS: रसलीन, श्रृंगार रस।

 


प्रस्तावना -

सूर से जिसका परिपाक अच्छी प्रकार दिखायी देता है। रीतिकाल में श्रृंगार रस की प्रधानता की घोषणा ही कर दी गई। भिखारी दास ने तो इस घोषणा पत्र का पृष्ठांकन कर दिया -

काव्य का सार सिंगार बखानौं,

सिंगार का सार किसोर-किसौटी।।

रसलीन अपने रस विवेचन में व्यक्त करते है-1

रस को रूप बखानि के बरनौ नौ रसनाम।

अब बरनत सिंगार को जाही ते सब काम।

 

यहाँ जाही ते सब काम से श्रृंगार रस की प्रधानता प्रकट होती है। रीतिकालीन कवियों के काव्य का मुख्य लक्ष्य श्रृंगार रस का आस्वादन रहा है। चाहे भाव वर्णन हो या रस वर्णन, नख-शिख वर्णन हो अथवा नायिका भेट वर्णन, सबके मूल में श्रृंगार की प्रधानता है।

 

श्रृंगार के बिना किसी भी वर्णन में रसात्मकता नही लायी जा सकती। रस की धारा इसी से प्रस्फुटित होकर समस्त काव्य को रस सिक्त करती है। इसीलिए रसलीन श्रृंगार को श्रेयस्कर रस मानते हैं। वे इसके प्रमाण में कहते हैं-2

 

जब निकस्पो सब रसन में यह रसराज कहाइ।

तब बरन्यौ कवि सबते पहिले लाइ।।

 

इस प्रकार रसलीन श्रृंगार रस को महत्व देते हैं। भावों से रस की उत्पत्ति होती है, जहां तक श्रृंगार रस के स्थायी भाव का प्रश्न है, भरतमुनि, धनंजय, विश्वनाथ, पण्डितराज जगन्नाथ, सभी श्रृंगार रस  के रति को स्थायी भाव मानते हैं। सभी आचार्यों में रस के आदि आचार्य भरत का मत इस प्रकार है -3

 

इष्टार्थ - विषय - प्रप्त्य रति, समुपजाते

सौम्यात्वाद अभिनेया सा वा अमाधुर्यान चेष्टतैः।।

 

इसके पूर्व भरतमुनि षष्ठ अध्याय के 17,18 श्लोक में भावों के रस को बताते हैं, यहां वे रति को परिभाषित करते हैं।

 

श्लोक के पूर्व रतिर्नाम आमोदात्मक भावः उद्धता श्लोक को प्रस्तुत करते है, जिसका अर्थ - इष्ट पदार्थ की प्राप्ति से रति उत्पन्न होती है। इसका अभिनय, सौम्यता वाणी के माधुर्य तथा उपयुक्त अंगिक चेष्टाओं द्वारा किया जाना चाहिए।

 

भरत के मत का सभी आचार्य समर्थन करते हैं। सभी आचार्य रति के दो लक्षण मानते हैं- एक तो स्त्री-पुरूष की पास्परिक अनुरक्ति, दूसरा आदान-प्रदान करने वाला भाव।

 

रसलीन का रति संबंधी दृष्टिकोण-रसलीन का विचार है कि प्रियजन को देखने अथवा उसके विषय में कुछ सुनने से मन में जो प्रीतिभाव पैदा होता है, उसे रति कहते हैं। यही श्रृंगार का स्थायी भाव है।4

 

प्रियजन लखि सुन जो कछुक प्रीतिभाव चित होइ।

सो रति भाव सिंगार को थाई जान्यो सोई।।

रति का उदाहरण वे इस प्रकार देते है-5

तुव हित नव तक नेह को उपज्यौ हरि हित आइ।

सुरति सलिल सींचति रहति सफल होनि के चाइ।।

वै चिकनी बतियाँ रहीं तिय हिय ज्योति जगाय।

पूरन करिये ने तो अतिदीपति सरसाय।।

 

रति उत्पत्ति का मूल कारण रसलीन विभाव मानते हैं। उन्होने अन्य आचार्यों की भाँति इसके दो  विभेद किये हैं- आलम्बन और उद्दीपन जिसके द्वारा स्थायी भाव की उत्पत्ति होती है, उसे आलम्बन तथा जिससे भाव उद्दीप्त होते हैं उसे उद्दीप्त विभाव कहते हैं। विभाव के लक्षण वे इस प्रकार देते हैं-6

 

थाइ कारन के सुकवि कहत विभाव विशेषि।

सो द्वै विधि आलम्बन अरू उद्दीपन अवरेषि।।

उपजे थाइ जाहि लै सो आलंबन जानि।

अधिक जाहि ते होइ सो उद्दीपन पहिचानि।।

 

भरत के अनुसार वाचिक, आंगिक, सात्विक भाव जिनके द्वारा प्रकट किये जाते हैं, उन्हे विभाव कहते हैं। धनंजय का लक्षण भी भरत से ही मिलता-जुलता है। अभिनवगुप्त के अनुसार जिसका ज्ञान हो सके वह विभाव है।

 

रति के विभाव-कार्य कारण सिद्धान्त के अनुसार श्रृंगार के स्थायी भाव रति के दो कारण मानते हैं। उनमें एक आलम्बन नायक-नायिका दूसरा उद्दीपन (आलम्बनगत चेष्टाएं) आलम्बन के सहारे रस की प्राप्ति होती है। रति में कामवृति जागृत होती है। प्रकृति स्वतंत्र रूप से आलम्बन बनती है। काम मानव की हृततन्त्री को जागृत करने वाली चित्तवृत्ति अपने जागरण का सहारा ढूँढती है। रीतिकालीन आचार्य कभी-कभी ऐसी भूल करते हैं कि उद्दीपन को आलम्बन के अंतर्गत परिणित कर देते हैं। रसिकप्रिया में केशव ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जो उद्दीपन है, उसे वे आलम्बन मानते हैं। उल्लेखनीय है कि रीतियुगीन कवियों में तथा आचार्यों ने आलम्बन विभाव को रसात्मक चित्तवृत्ति के जागरण साधना के रूप में माना है। यहां  प्रकृति का स्वतंत्र रूप आलम्बन के रूप में कठिन है।

 

रसलीन की मान्यता है कि जिसके द्वारा स्थायी भाव की उत्पत्ति हो वह आलम्बन है7 तथा जिससे अधिक हो वह उद्दीपन है।

 

अर्थात जिसके द्वारा स्थायी भाव उद्दीप्त हो उसे उद्दीपन विभाव समझना चाहिए। यह एक तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है। केशव से भिन्न रसलीन से उद्दीपन विभाव के अंतर्गत प्रकृति के स्वतंत्र रूप का भी वर्णन किया गया है। सत्र तो ये है कि रसलीन की रचनाओं में प्रकृति का उद्दीपन रूप अधिक उजागर हुआ है।

 

इसका कारण यह रहा है कि रसलीन इस तथ्य से परिचित थे कि प्रकृति के आश्रय और योग से मानव रूपभिव्यक्ति सजीव हो उठती है। रसलीन उद्दीपन विभाव के अंतर्गत सखी, दूती, सखा, कथन, षष्ट - ऋतुओं का वर्णन करते हैं। वे अंगज-संभोग उद्दीपन का भी वर्णन करते हैं। यहाँ षटऋतु वर्णन के कतिपय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

 

कहु लाबित विकसत कहूँ डोलावति वाइ।

कहू विदावति चाँदनी मधुरितु दासी आइ।।

मह मुधरितु मैं कौन के बढत मोद अनंत।

कोकिल गावत है कुहुकि मधुप गुंजत तंत।।

औषधीश सेग पाइ अरू लहि बसंत अभिराम।

मनोरोग राग हरन को भयो धनंतर काम।।

फूले कुन्जन अलि भॅवत सीतल चलत समीर।

मानि जाति काको मनु जात भानुजा तीर।।8

 

ऊपर के वर्णन में फूलों का खिलना चाँदनी का बसंत ऋतु में फैलना, बसंत ऋतु में कोयल का कुहुकना, मधुपों का गुंजार करना, चन्द्रमा और बसंत ऋतु का सम्मिलित होना, धनवंतरि के औषधि के समान सुखदायी है। कुंजो में फूले हुए फूलों पर भॅवरे गूंज रहे हैं। यह सारा वर्णन बसंत के उद्दीपक रूप का चित्र खींचता है।

 

रसलीन सखी और दूरी चित्रण को उद्दीपन के अंतर्गत मानते हैं। सखा-कथन, अंगज-सहयोग जोड देने पर उसका उद्दीपन का क्षेत्र विस्तृत हो जाता है। समग्रतः रसलीन का उद्दीपन विभाग वर्णन परंपरायुक्त, शास्त्रीय, व्यापक तथा सुरूचिपूर्ण है। रसलीन विभाग की भाँति अनुभाव को भी वर्णन करते हैं-9

 

जो थाई को आनि कै प्रकट करै अनयास।

सोई है अनुभाव यह वरनत बुद्धि निवास।।

यदि हम आचार्य विश्वनाथ के विचार को देखें तो वह रसलीन के समरूप है-10

उद्बुद्धं कारणैः स्वैः सवैर्वहिभार्व प्रकाशयन्।

लोक यः कार्यरूप सोअनुभावः काव्यनाट्योः।।

 

अर्थात् भाव अपने-अपने कारणों से भाव के हृदय में उद्बुद्ध होते हैं, उन उद्बुद्ध भावों को बाहर प्रकाशित कर देने वाले विकार जोकि लौकिक दृष्टि से कार्य रूप हैं, नाटक में अनुभाव कहलाते हैं।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

1ण्    रसलीन ग्रन्थावलीः - रस प्रबोध, दोहा 60

2ण्    वही दोहा 65-सं. सुधाकर पाण्डेय काशी नगरी, पचरिणी सभा वाराणसी, सं. 2-44 वि.

3ण्    भरतमुनिः नाटकशास्त्र, 7/9,सं. बाबूलाल शुक्ल चैखम्भा संस्कृति संस्थान वाराासी सं.वि. 2067

4ण्    रसलीन ग्रन्थावली - रस प्रबोध, दोहा 66

5ण्    वही, दोहा 67-68

6ण्    रसलीन ग्रन्थावली - रस प्रबोध, दोहा 50

7ण्    वही, दोहा 50

8ण्    वही, दोहा 50

9ण्    रसलीन ग्रन्थावली - रस प्रबोध, दोहा 673-76

10ण्   रसलीन ग्रन्थावली-रस प्रबोध, दोहा 51

11ण्   आचार्य विश्वनाथ: साहित्य दर्पण, 31/132 सं. शालिग्राम शास्त्री मोतीलाल बनारसीदास चैक वाराणसी, सं. नवम् संस्करण 1977

 

 

Received on 09.11.2021         Modified on 19.11.2021

Accepted on 29.11.2021         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(3):142-145.